Thursday, July 5, 2018

खिलौनों, किताबों की जगह बर्तन क्यो?

क्या भारत का विकास इनके हाँथ

क्या भारत का विकास इनके हाँथ?


बड़ी विडंबना की बात है। एक ओर हम सब का साथ, सब का विकास की बात कर रहे है। और दूसरी ओर बाल श्रम जैसी गंभीर सामाजिक समस्या की समाप्ति के प्रति कोई कारगर उपाय नही हो रहे। हमें विदित है कि 'बच्चें देश का भविष्य है' बावजूद इसके सरकार इस संवेदनशील मुद्दे पर विशेषतः ध्यान केंद्रित नही कर रही। हालांकि सरकार ने इसके लिए कई कानून भी बनाया है जिससे बालमजदूरी में लग़ाम लगाया जा सके परंतु लचक कानून होने के चलते अपराधी सरेआम इस अपराध को बढ़ावा दे रहे हैं। इसके अलावा सरकार द्वारा बच्चों के लिए सर्वशिक्षा अभियान, मिड डे मील जैसी तमाम योजनाएं भी बनाई है लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है।सरकार ने इतना कुछ अगर किया है तो यह समस्या समाज मे अभी भी क्यो व्याप्त है? बाल श्रम के इतनी तेजी से पैर पसारने का मूल है अशिक्षा, गरीबी, कर्ज़ का बोझ।अशिक्षा के कारण पिछड़े वर्ग के लोग अपने बच्चों को उचित शिक्षा नही दे पाते, गरीबी के कारण सही प्रोटीन न मिलने के फलस्वरूप बच्चों में कुपोषण जैसी गंभीर बीमारीयां होती है, कर्ज तले दबे होने के कारण गरीब को मज़बूरन बच्चों को मज़दूरी के लिए भेजना पड़ता है। समाज मे कुछ ऐसे अराजकता वाले तत्व भी मौजूद हैं जो अभी तक ज़मीदारी और लम्बरदारी की प्रथा से उभर नही पा रहे। इन लोगो ने बालश्रम को बढ़ाने में पेट्रोल का काम है। सरकार अकेले इस सामाजिक बुराई को समाप्त नही कर सकती। सरकार के साथ-साथ हम सब का भी उत्तरदायित्व बनाता है कि बालश्रम की समस्या को एक जनांदोलन बनाकर देश से उखाड़ फेंके।

✎✎✎ लेखक - शिवम तिवारी


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