Thursday, July 5, 2018

अंको में संकुचित शिक्षा प्रणाली।

पास या फेल से न तौले अपना जीवन /

पास या फेल से न तौले अपना जीवन /


ज कल की शिक्षा व्यवस्था की कलाई खुलने से नही रह गई। वास्तव में वर्तमान की शिक्षा स्थिति केवल पास फेल तक ही संकुचित हो गई हैं। उसमे भी केवल पास, फेल के लिए कोई स्थान नही। 80, 90 प्रतिसत अंक लाने वाले विद्यार्थियों में कुछ ऐसे भी है जो अपने आप से भी संतुष्ट नही होते है। जिसका असर भी अन्य प्रतियोगिताओं में दिखता है की वह अनुत्तीर्ण हो गए है। इस तरह की शिक्षा से बेहतर तो फेल हो जाना। लेकिन कोई भी फेल नही होना चाहता जिसका कारण असामाजिक तत्वों द्वारा इसे हीनता से देखा जाना।आत्महत्या करने वाले विद्यार्थियों का कारण भी यही है कि हमारा समाज बचपन से हमे सिर्फ उत्तीर्ण होना सिखाता है अनुत्तीर्ण होने पर उससे सीख लेना कोई नही सिखाता। जबकि अप्रत्यक्ष रूप से दिखता है कि अनुत्तीर्ण होना हमे अंदर से सुदृढ़ बनाता है जिससे तनाव से लड़ने में सहायता मिलती है। आज विद्यार्थियों उस क्षेत्र भागते है जहां फायदा ज्यादा न कि वहां जाते जहां उनकी रुचि है। हमारी शिक्षा व्यवस्था भी ऐसी है जो छात्रों को किताबी कीड़ा और डिग्री वाला पुतला बना रही है। कालेज स्कूल आज बेरोजगार बनाने की मशीन बन गई हैं। इन्हीं कारणों से आज हमारे देश को क्लर्को का देश कहा जा रहा है। एक ओर हम चीन, अमेरिका, रूस से तकनीकी व आर्थिक क्षेत्र में आगे जाना चाहते है और दूसरी ओर हमारी शिक्षा के सारे तरीके दस साल से भी पुराने है जिनका आधुनिकता से कोई सरोकार नही। हमारे यहां विद्यार्थियों के लिए प्रयोग को तवज्जो ही नही दी जाती। जबकि अन्य विकासशील देशों में इसका विपरीत है। वहाँ शिक्षा के साथ साथ प्रयोगों को अधिक तवज्जो दी जाती है। इसी कारण इन देशों के लोग आत्मनिर्भर है न कि सरकार के रोजगार के भरोसे।

लेखक - शिवम तिवारी

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