Monday, July 9, 2018


क्या प्लास्टिक करेगी दुनिया का खात्मा ?

   आज परमाणु युग के साथ प्लास्टिक युग भी चल रहा है, दुनिया के लिए दोनों ही एक चिन्ता का विषय है,अगर नज़र डाली जाए पूरब से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण जहाँ भी नज़र जाएगी वहाँ कुछ नज़र आये न आये परन्तु प्लास्टिक बैग ज़रूर नज़र आ जाएगा, आज के समय तो प्लास्टिक मानव जीवन का एक हिस्सा बन गयी है,व्यक्ति चाहे दुकानदार हो या उपभोक्ता बिना प्लास्टिक उसका सामान अधूरा है, जबकि सभी जानते है कि प्लास्टिक का उपयोग करना शरीर के साथ जीवन यापन करने के लिए कितना हानिकारक है, आज हमारे बीच जो पशु,पक्षी आदि है जिनके पास बोलने के लिए जुबान नहीं है जब वो प्लास्टिक का सेवन कर लेते है तो उनके लिए किसी ज़हर से कम नहीं है। आज मानव जब अपने शरीर,परिवार के लिये अच्छा  सोच सकता है तो दूसरों के लिए क्यों नहीं ?
    चूँकि प्लास्टिक सस्ती, हल्की और मजबूत होती परन्तु मानव को समझ नहीं आता कि प्लास्टिक पेट्रोलियम और अन्य हानिकारक गैस को मिलाकर बनती है,ये विघटित नहीं हो सकती, इसे विघटित होने के लिए कम से कम 10,000 वर्ष  का समय लगता है प्रतिवर्ष पूरी दुनिया में 500 खरब के करीब प्लास्टिक बैग का उपयोग किया जाता है, और इस प्रकार एक मिनट में एक अरब से अधिक बैग का इस्तेमाल किया जाता है।
   हमारे भारत में कई शहर ऐसे है जहाँ पर प्लास्टिक ने पूरा एक्छत्र राज कायम करके रखा हुआ है इसमें से एक है जयपुर जहां सबसे ज़्यादा प्लास्टिक प्रोयोग होती है। प्लास्टिक बैग से हमारी ज़मीन से लेकर पानी तक सब कुछ प्रदूषित हो रहा है,जब ये प्लास्टिक बैग नदी में जा के गिरते है तो धीरे धीरे अपना केमिकल पानी मे छोड़ते फिर जब वो पानी जानवर, पशु,पक्षी आदि पीते है तो मर जाते है। इसी कारण करीब 1,00,000 जीव की जैसे डॉल्फिन, कछुए, व्हेल, पेंगुइन आदि मर चुके है,वहीं कुछ जानवर इसे खाने की चीज समझकर खाते है और वो भी मर जाते है। ये जीव जंतुओं और जानवर के साथ मानव के लिए भी हानिकारक है, जैसा कि हमने बतया है ये पेट्रोलियम से बनी होती है जो 10,000 वर्ष तक विघटित नही हो सकती तो अंदाज़ लगाया जा सकता है कि हम जो समान दुकान,होटल आदि पैक करा के घर लाते है और बड़े चाव से खाते है वो शरीर के लिए कितना हानिकारक है,एक प्रकार से खाने में आधा ज़हर खाते है।
   बात जब प्रदूषण की आये तो वहाँ भी प्लास्टिक ने अपनी धाक जमाने में कोई कसर नहीं छोड़ी रोड हो,गली हो या कोई मोहल्ला हर जगह इसका प्रदूषण है। लोग प्लास्टिक का इस्तेमाल करने के बाद उसे जला देते हैं जिससे वायु प्रदूषण पनपता है और शरीर के लिए हानिकारक होता है। प्लास्टिक का इस्तेमाल आप चाहे किसी भी प्रकार में करें हमेशा नुकसान के अलावा कुछ नहीं मिलेगा।आज करीब 40 देश प्लास्टिक बैग पर प्रतिबंध भी लगा चुके हैं, वही संयुक्त राष्ट्र ने प्लास्टिक पर कहा है कि इसे पूरी तरीके से पूरे विश्व मे प्रतिबंधित होना चाहिए और उसने ये बात सख्ती के साथ बोली है, आयरलैंड में तो प्लास्टिक की कीमत समान से ज़्यादा है तो लोग प्लास्टिक बैग लेने में कतराते है, यही नियम यूनाइटेड किंगडम, ऑस्ट्रेलिया और न्यू यॉर्क सख्ती के साथ अपने देश मे पालन कर रहे हैं।
   अतः हमें प्लास्टिक को प्रोयोग में नही रखना इसका ध्यान देना होगा नही वो दिन दूर नही की दुनिया खाना की जगह प्लास्टिक खाएगी, पर्यावरण बचना है तो पेड़ लगाओ प्लास्टिक की फैक्टरी नहीं।

                                  कानपुर

Thursday, July 5, 2018

समाज की सोच का पतन

 

बुराईयों से खुद को बचायें।

आज के वर्तमान समय में हमारा समाज दिशा की ओर अग्रसर है उससे यह स्पस्ट अनुमान लगाया जा सकता है कि हमारेे समाज का अग्रिम समय निश्चित अंधकार में होगा। क्योंकि जिस प्रकार आज की पीढ़ी के व्यक्तियों की सोच में बुराई घर करके बैठी है। उससे अंदाजा लगाना ज्यादा मुश्किल नहीं होगा कि समाज किस दिशा की ओर उन्नमुख है। आज का युवा अपनी संस्कृति से इस तरह से पीछा छुड़ाता है जैसे वह कोई व्याधि हो। लेकिन उन्हें समझना होगा की हमारी संस्कृति ही नही होगी तो हमारे समाज का अस्तित्व भी समय के साथ समाप्त हो जाएगा। क्योकि संस्कृति ही किसी सभ्यता का मूल होती और जब उस पर ही आघात होगा तो सभ्यता का पतन होना निश्चित है।

      लेखक - शिवम तिवारी

धीमा जहर यानी प्रदूषण।

प्रदूषण मुक्ती को धरती तरसती।
जहर का कार्य किसी इंसान जीव की जान लेने तक ही सीमित नहीं है। अपितु यह किसी राष्ट्र को समूचा समाप्त करने की छमता विधमान होती है। और जहर का एक सच्चा साथी प्रदूषण है जिसकी चपेट में आने से अनेकों बीमारियां घर करने लगती हैं। प्रदूषण कोई एक प्रकार किसी स्थान को अपने कब्जे में ले ले तो वह अपने साथ की अन्य प्रकार के प्रदूषण को भी स्थान देता है। जैसे किसी स्थान पर मृदा प्रदूषण हैं तो उस क्षेत्र में धीरे-धीरे वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण आदि भी हावी होने लगते है। इस जहर के फैलने का प्रमुख श्रेय हम मानव को जाता है। जो अपनी सुविधाओं के लिए नाना प्रकार की रसायनों, खनन, उद्दोगों, वाहनों का प्रयोग करके प्रकृति के विरूद्ध कार्य करते है।
लेखक - शिवम तिवारी

अंको में संकुचित शिक्षा प्रणाली।

पास या फेल से न तौले अपना जीवन /

पास या फेल से न तौले अपना जीवन /


ज कल की शिक्षा व्यवस्था की कलाई खुलने से नही रह गई। वास्तव में वर्तमान की शिक्षा स्थिति केवल पास फेल तक ही संकुचित हो गई हैं। उसमे भी केवल पास, फेल के लिए कोई स्थान नही। 80, 90 प्रतिसत अंक लाने वाले विद्यार्थियों में कुछ ऐसे भी है जो अपने आप से भी संतुष्ट नही होते है। जिसका असर भी अन्य प्रतियोगिताओं में दिखता है की वह अनुत्तीर्ण हो गए है। इस तरह की शिक्षा से बेहतर तो फेल हो जाना। लेकिन कोई भी फेल नही होना चाहता जिसका कारण असामाजिक तत्वों द्वारा इसे हीनता से देखा जाना।आत्महत्या करने वाले विद्यार्थियों का कारण भी यही है कि हमारा समाज बचपन से हमे सिर्फ उत्तीर्ण होना सिखाता है अनुत्तीर्ण होने पर उससे सीख लेना कोई नही सिखाता। जबकि अप्रत्यक्ष रूप से दिखता है कि अनुत्तीर्ण होना हमे अंदर से सुदृढ़ बनाता है जिससे तनाव से लड़ने में सहायता मिलती है। आज विद्यार्थियों उस क्षेत्र भागते है जहां फायदा ज्यादा न कि वहां जाते जहां उनकी रुचि है। हमारी शिक्षा व्यवस्था भी ऐसी है जो छात्रों को किताबी कीड़ा और डिग्री वाला पुतला बना रही है। कालेज स्कूल आज बेरोजगार बनाने की मशीन बन गई हैं। इन्हीं कारणों से आज हमारे देश को क्लर्को का देश कहा जा रहा है। एक ओर हम चीन, अमेरिका, रूस से तकनीकी व आर्थिक क्षेत्र में आगे जाना चाहते है और दूसरी ओर हमारी शिक्षा के सारे तरीके दस साल से भी पुराने है जिनका आधुनिकता से कोई सरोकार नही। हमारे यहां विद्यार्थियों के लिए प्रयोग को तवज्जो ही नही दी जाती। जबकि अन्य विकासशील देशों में इसका विपरीत है। वहाँ शिक्षा के साथ साथ प्रयोगों को अधिक तवज्जो दी जाती है। इसी कारण इन देशों के लोग आत्मनिर्भर है न कि सरकार के रोजगार के भरोसे।

लेखक - शिवम तिवारी

खिलौनों, किताबों की जगह बर्तन क्यो?

क्या भारत का विकास इनके हाँथ

क्या भारत का विकास इनके हाँथ?


बड़ी विडंबना की बात है। एक ओर हम सब का साथ, सब का विकास की बात कर रहे है। और दूसरी ओर बाल श्रम जैसी गंभीर सामाजिक समस्या की समाप्ति के प्रति कोई कारगर उपाय नही हो रहे। हमें विदित है कि 'बच्चें देश का भविष्य है' बावजूद इसके सरकार इस संवेदनशील मुद्दे पर विशेषतः ध्यान केंद्रित नही कर रही। हालांकि सरकार ने इसके लिए कई कानून भी बनाया है जिससे बालमजदूरी में लग़ाम लगाया जा सके परंतु लचक कानून होने के चलते अपराधी सरेआम इस अपराध को बढ़ावा दे रहे हैं। इसके अलावा सरकार द्वारा बच्चों के लिए सर्वशिक्षा अभियान, मिड डे मील जैसी तमाम योजनाएं भी बनाई है लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है।सरकार ने इतना कुछ अगर किया है तो यह समस्या समाज मे अभी भी क्यो व्याप्त है? बाल श्रम के इतनी तेजी से पैर पसारने का मूल है अशिक्षा, गरीबी, कर्ज़ का बोझ।अशिक्षा के कारण पिछड़े वर्ग के लोग अपने बच्चों को उचित शिक्षा नही दे पाते, गरीबी के कारण सही प्रोटीन न मिलने के फलस्वरूप बच्चों में कुपोषण जैसी गंभीर बीमारीयां होती है, कर्ज तले दबे होने के कारण गरीब को मज़बूरन बच्चों को मज़दूरी के लिए भेजना पड़ता है। समाज मे कुछ ऐसे अराजकता वाले तत्व भी मौजूद हैं जो अभी तक ज़मीदारी और लम्बरदारी की प्रथा से उभर नही पा रहे। इन लोगो ने बालश्रम को बढ़ाने में पेट्रोल का काम है। सरकार अकेले इस सामाजिक बुराई को समाप्त नही कर सकती। सरकार के साथ-साथ हम सब का भी उत्तरदायित्व बनाता है कि बालश्रम की समस्या को एक जनांदोलन बनाकर देश से उखाड़ फेंके।

✎✎✎ लेखक - शिवम तिवारी


क्या प्लास्टिक करेगी दुनिया का खात्मा ?    आज परमाणु युग के साथ प्लास्टिक युग भी चल रहा है, दुनिया के लिए दोनों ही एक चिन्ता का ...